उनका हर अघोषित प्रश्न
उलगुलान है खुद से
सब कुछ जान लेना चाहता है / मेरे बारे में
मतलब सब कुछ
जैसे आसमानी चीले / उड़ते पक्षीयों के रंग
जान लेती है
जान लेती है रोहू मछलिया / बंसी के चारे
को
लोमड़िया पके खरबूजे
वह जान लेना चाहते हैं मेरी गहराई
जैसे एक असुंदर कन्या को जान लेना चाहता
है
संभावित दुल्हा
सारा अभिकल्प नाम से शुरू होता है
अपना पूरा नाम बताइए
संकोच बस
नहीं नहीं आगे क्या लगाते हैं
मेरा मतलब आपके पूरे नाम से है
शर्मा वर्मा राजपूत
फिर मेरी जाति से शुरू होता है भाषा का
अंतहीन व्याकरण
संज्ञा सर्वनाम हिज्जय सब एक साथ
जाति तब मेरे लिए शर्म है या गौरव
पहली बार ठीक से जान पाता हूँ
अब आरक्षण की चर्चा बंद हो जाती है
आरक्षण
1.
वह जो हथियार बन सकता था
वंचितों का
वह जो नाइ की नहन्नी
बसूली था मजदूर की
वह जिससे संभावना की कील गाड़ी जा सकती थी
जो तलवारों को तरकश बना सकता था
जो उल्टे पाँव भी भगा सकता था महिपों को
जो रेल की पटरियों को रखता था सीधा
जो लुहार की धौकनी को जिन्दा रखता था
वह जिससे अधिकतम प्यार और घृणा की जा सकती
थी
धरती को छोड़कर कहीं भी
आज मुखातिब था
‘समानता’ शब्द बनकर
2.
अदहन की तरह खौल रही है भूख
माँ डालेगी थोडा चावल ज्यादा पानी
उतारेगी पसावन
फिर बच्चो में बाँट देगी आरक्षण
कुछ नमक कुछ साग
सबके लिए तय है
माँ सबसे कमजोर और छोटे बच्चे को ज्यादा
देगी प्यार
दुर्बल को सबकुछ
सहभाव है सबके भीतर
पर भूख बड़ी चीज है
3.
उनकी किताब के हर पन्ने में
हमें जाहिल गंवार और असभ्य होना लिखा है
उनकी लिखी किताबों से हमारी नियति तय होती
है
वो आज भी हमें अछूत मानते हैं
हम उनके लिए पढ़े लिखे नहीं / हो भी कैसे
सकते हैं
मानसिक बलात्कार की आदिम शिक्षा
कब से जीवित है उनके भीतर
नहीं जानता मैं/पर जानता हूँ
उनकी खाक मिटाने एक दिन घाटपर मैं ही
मिलूँगा
देख लेना
४.
थोड़ी सी धूप, थोड़ी हवा, थोडा पानी
सब चाहिए थोड़ा थोड़ा
मुनासिब हक़
उनकी दया पर है
साठ साल से न मिला वाजिब हक
अब भी उनकी दया पर है
माई बाप दें न दें
उन्हें कुछ और वक्त चाहिए
इस शब्द के लिए
नीली नहीं हैं
तुम्हारी आँखे
बेचारगी के सपने / तुम्हारी पुतलियों के
आसपास
जिम्मेदारी का हथौड़ा
तुम्हारी कठोर हथेलियों में
पथराये चेहरे पर धंसी धंसी
सोचता हूँ नीली क्यों नहीं हैं तुम्हारी
आँखे
एक आम आदमी
वह हिकारत भरी नजरों से देखता
खुले खुले आसमान को
कभी तलहटी में फैले सन्नाटे को
कभी खिले हुए फूल को
जब मन बोझिल हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता
है
वह जन्मते देखता आकाश कुसुम
जिधर भी बढ़ता बढ़ जाती सूनी धरती
जाने कितने रक्तबीज पैदा होते और मर जाते
उसके अपने भीतर
अट्ठाईस साल की मुकम्मल उम्र में वह दीखता
अधेड़ सा
समझौते की उम्र
सिर पर वैताल सी सवार होती
ताने मारते लोगों का जमावड़ा भीतर के तालाब
में
कुलांचे मारता
बंद होते संभावनाओं के सारे द्वार
वह थके बैल सा दौड़ता
और हांफ जाता बेरोजगारी पर
वह एक युद्धरत आम आदमी
अन्ना नहीं हो सकता था
भवदीय
डॉ. कर्मानंद आर्य,
सहायक प्राध्यापक
भारतीय भाषा केंद्र
बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, पटना
चलभाष : ०८०९२३३०९२९