आज यह शहर छोड़ते हुए
जिन्दा हो गए हैं कई एहसास
बालकनी पर नीले पंखों वाली नन्ही चिड़िया का आ जाना
किसी को सीढियों से उतरते
देखना, देखकर मुड़ जाना
सब कुछ छूट रहा धीरे धीरे
तुम्हे तो याद है शायद
चलो, छोड़ो, जाने दो
एक सूखे एहसास के सहारे
जागता रहा था कई – कई रातें
सिर्फ तुम्हारे कह देने मात्र से
चलो, खैर कई साल हो गए
तुम्हारे इस अपने शहर में
एम् ए करने के बाद रिसर्च
उसके बाद फिर एम्.ए
कितना अजीब लगता है न
दिन काटना
पर तुम तो स्वयं भुक्तभोगी हो
सूखी हँसी हसने को
फिर भी जी नहीं करता की छोड़ दूँ तुम्हारा शहर
आज यह शहर छोड़ते हुए
बीते अनबीते और भी कई पल हैं आस पास
तुम्हारी जम्हाई से जन्मने वाले
तरावटी बोसों के मानिंद
यहाँ की हवा अपनी सी हो गई है
सरसराती है या हौले-हौले
इठलाती है पत्तियों पर
या आबनूस के पेड़ों पर अचानक चढ़कर
दिला देती है माँ की याद
माँ भी आसमान सी बाहें फैलाए
कहीं भी दुलार लेती थी तुम्हें
इन बंजर होती यादों में
सूखे पड़े हैं चाय के कुछ कप
दराज में पड़ी हैं मूंगफलियाँ
और तुम्हारे इंतजार में खड़े-खड़े हम
वर्षों से तुम्हे पाने की कोशिश में
हो गए हैं आवारागर्द
तुम जानते हो न
एक एक कर छूटने वाले लोगों को
पास आते या दूर जाते छोटे छोटे पलों को
शाम को गुजरते राकेटों की तरह
उन धुंए जैसे धुधली यादों को
जिसे तुम्हें सुनाकर
हल्का कर लेता था मैं अपना बोझ
तुम्हारा शहर छोड़ते हुए
छोड़ जा रहा हूँ वह पुरानी गिटार
जिसे तुम लायीं थी दरियागंज से
आखिर वह भी तो पुरानी हो चली है.
हरिद्वार, २५/०२/०९