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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

अभी हाल ही में डॉ. अल्पना सिंह की  ‘‘लोक साहित्य और संस्कृति का वर्तमान स्वरूप‘‘ विषय पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक आयी है. पुस्तक अभी तक प्रकाशित लोक कला और संस्कृति के उन पह्लुवाओं को सामने लती है जिसपर अभी बात नहीं हुई है. डॉ. अल्पना का यह प्रयास बहुत ही सार्थक बन पड़ा है लेखिका का वैदुष्य पुस्तक में हर तरफ दिखाई देता है जिससे उनके गंभीर अध्येता होने का पता चलता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षित करता है. संस्कृति के बदलते रूपों के अलावा पुस्तक उत्तर आधुनिकता और भूमंडलीकरण इत्यादि प्रश्नों को गंभीरता से उठती है. इसी पुस्तक का हंस के जनवरी 2014 के अंक में प्रसिद्द चिन्तक और साहित्यकार डॉ. वीर भारत तलवार द्वारा लिखा गया समीक्षात्मक लेख प्रकाशित हुआ है. वर्तमान समय में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया ने हमारी अनमोल धरोहर लोक-साहित्यतथा लोक संस्कृति के विविधि पक्षों का अवलोकन करती यह पुस्तक जनभाषाओं के लोक और साहित्य के वृहद् पक्ष को रेखांकित करती हैं. दलित जीवन की त्रासदी और लोककला संस्कृति को रेखांकित आलेख ‘लोक साहित्य में हासिये का स्वर’ जो प्रसिद्द दलित चिन्तक जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है, पठनीय है. पुस्तक में हिंदी की विविध बोलियों का लोक साहित्य, लोक गीत, लोक कला, सांस्कृतिक अध्ययन पर अनेक अध्याय हैं.
पुस्तक का नाम : लोक साहित्य और संस्कृति का वर्तमान स्वरूप
संपादक        : डॉ.अल्पना सिंह/ डॉ.अशोक मर्डे
ISSBN              : 978-93-82485-29-2
मूल्य          : 595
प्रकाशक        : वांग्मय बुक्स,   दोदपुर रोड, अलीगढ़
मो.          : 9719304668

                                   Vangmaya.prakashan@gmail.com