वसंतसेना
.............................
नायकों की एक विशाल पंक्ति
बाहर खड़ी है
आज के दिन भी तुम उदास हो वसंतसेना
कितने बिस्मिल्लाह खड़े हैं
अपनी शहनाइयों के साथ
कितने तानसेन गा रहे हैं
सधे सुरों का गीत
अपने सधे क़दमों से
नृत्य की मुद्रा में आज है
‘दाखनिता कुल’
उल्लास का मद अहा
चोर, गणिका, गरीब, ब्राह्मण, दासी, नाई
हर आदमी आज है नायक
चारुदत्त आये हैं वसंतसेना
फिर भी हो तुम उदास
वसंतसेना निर्व्याज नही जायेगा तुम्हारा प्रेम
प्रकृति उत्तम है
उदास क्यों होती हो ?
क्या गणिकाओं का विवाह नहीं होता वसंतसेना?
.............................
नायकों की एक विशाल पंक्ति
बाहर खड़ी है
आज के दिन भी तुम उदास हो वसंतसेना
कितने बिस्मिल्लाह खड़े हैं
अपनी शहनाइयों के साथ
कितने तानसेन गा रहे हैं
सधे सुरों का गीत
अपने सधे क़दमों से
नृत्य की मुद्रा में आज है
‘दाखनिता कुल’
उल्लास का मद अहा
चोर, गणिका, गरीब, ब्राह्मण, दासी, नाई
हर आदमी आज है नायक
चारुदत्त आये हैं वसंतसेना
फिर भी हो तुम उदास
वसंतसेना निर्व्याज नही जायेगा तुम्हारा प्रेम
प्रकृति उत्तम है
उदास क्यों होती हो ?
क्या गणिकाओं का विवाह नहीं होता वसंतसेना?
मत्स्यगंधा
......................................
एक:
जातियों का बंधन
टूटता है
तुम्हारे प्रणय
के स्पर्श से
जिसे तोड़ नहीं
पायी
पवित्र माने जाने
वाली ऋचायें
उसे तोड़ दिया
रूप की आकांक्षा
ने
तृषा जागती है
देव, गंधर्व, कोल, किरात
सब लोटते हैं
तुम्हारे चरणों में
अरे यह क्या ?
तुम समय की भाषा पढ़ने
लगी हो
तुममें भी आ गए
हैं
उच्च वर्णस्थ
स्त्री के भाव
अच्छा है
तुम्हारा यह निर्णय भी
तुम उसी से विवाह
करोगी
जो देव, गन्धर्व, कोल, किरात नहीं
तुम्हारी जाति का
होकर रहेगा
मत्स्यगंधा
.........................................
दो:
तुम्हारा पति आज
मछलियाँ पकड़ने
नहीं गया
उसे सता रही थी
अद्भुत प्यास
वह तुम्हारे
आसपास मंडराता रहा
यह बसंत की
दोपहरी नहीं है
जब गाती है कोयल
कि... कि...
कि....
करके दौड़ती है
गिलहरी
वह आज तुम्हें
गिलहरी की तरह
दौड़ाना चाहता है
रेंगती रहो जल, थल, आकाश
आज जाल के साथ
नहीं
तुम्हारे साथ
फसेंगा
उसका प्रथम प्रणय
गीत
हर दिन काम
का
हर दिन प्रेम का
होना चाहिए!
‘होना चाहिए न मत्स्यगंधा’ !!!!!!
रमई राम की बेटी
.........................................................
मुझे केवल मेरे कद से मत नापो
मुझे मत नापो मेरे काले रंग से
मेरे चलने के सलीके से मत नापो
मासिक से नहाई हुई मैं अपवित्र लड़की नहीं हूँ
इतिहास की ओर बढ़ रहे हैं मेरे कदम
मैं सीता नहीं होना चाहती
मैं नहीं होना चाहती सावित्री
मुझे किसी दूसरे जैसा नहीं बनना
जितनी तुम्हें दिखाई देती हूँ
जितना तुम्हें सुनाई देती हूँ
केवल उतनी लम्बी नहीं हूँ मैं
मैं गंदगी से बची हुई सबसे लम्बी नदी हूँ
मैं गंगा नहीं हूँ जमुना नहीं हूँ नहीं हूँ सरस्वती
नाम सोचा जाना चाहिए मेरा
मुझे मत नापो क्योंकि गहराई बढ़ रही है धीरे-धीरे अंतराल की
समुद्र और गहरे हो रहे हैं
और गहरा हो रहा हैं गुस्सा मेरी धमनियों में
पुरुष लुप्तप्राय हैं
घाटी में फंसे हुए सिपाहियों से कहो
अब दलिताएं तुम्हारी सल्तनत नहीं
नाजिम हिकमत से कहो वे लिखें मेरी दास्तान
सुशीला भोतमंगे से कहो
तुम्हें न्याय मिलेगा मेरी बहन
कबीर कला मंच जिन्दा है
डॉक्टर, वकील, अध्यापक से कह दो
समय के साथ वे बदल लें अपना स्लैबस
जिज्ञासाओं का अनंत संसार मेरे भीतर समाया है
बहुत गहरे विशाल ह्रदय में रहते है कई समुद्र
कई योजन सड़कें ख़त्म नहीं होती लाखों वर्ष चलते हुए भी
मैं पद्मिनी नायिका नहीं हूँ
कि स्तन के लोथड़े और मांस के फैलाव को
जीवन की धुरी मान लूँ
मैं चलती हूँ अपने बहुत छोटे क़दमों से
और जीत लेती हूँ आकाश में तुम्हारी बादशाहत
मैं चलती हूँ निरंतर, मैं नींद में भी चलती हूँ
मैं चलती हूँ क्योंकि मुझे चलने की कीमत पता है
पावों में काटती है जूती, हाथों में चूड़ी
कमर में करधनी काटती है
तुम काटते हो पान का पत्ता थूक के लिए
तुम नाखूनों से काटते रहे मैं काटती रही हूँ नाख़ून
पर अब समय बदल रहा है
लोहा काटेगा लोहा कटेगा
मुझे नहीं खेलना गन्दा खेल
मुझे नहीं खेलनी तुम्हारी होली
मैं जानती हूँ तुमने मुझे जलाया है
मैं राख में बची हुई चिंगारी हूँ
तबसे जल रही हूँ जबसे सीता समा गई धरती की कोख में
सावित्री ने त्याग दिए प्राण
राधा को उसका पति छोड़कर चला गया
मुझे मेरे कद से मत नापो
मैं कल्पना चावला नहीं इरोम की बहन हूँ
रमई राम की बेटी
मैं पद्मिनी नायिका नहीं हूँ
कि स्तन के लोथड़े और मांस के फैलाव को
जीवन की धुरी मान लूँ
.........................................................
मुझे केवल मेरे कद से मत नापो
मुझे मत नापो मेरे काले रंग से
मेरे चलने के सलीके से मत नापो
मासिक से नहाई हुई मैं अपवित्र लड़की नहीं हूँ
इतिहास की ओर बढ़ रहे हैं मेरे कदम
मैं सीता नहीं होना चाहती
मैं नहीं होना चाहती सावित्री
मुझे किसी दूसरे जैसा नहीं बनना
जितनी तुम्हें दिखाई देती हूँ
जितना तुम्हें सुनाई देती हूँ
केवल उतनी लम्बी नहीं हूँ मैं
मैं गंदगी से बची हुई सबसे लम्बी नदी हूँ
मैं गंगा नहीं हूँ जमुना नहीं हूँ नहीं हूँ सरस्वती
नाम सोचा जाना चाहिए मेरा
मुझे मत नापो क्योंकि गहराई बढ़ रही है धीरे-धीरे अंतराल की
समुद्र और गहरे हो रहे हैं
और गहरा हो रहा हैं गुस्सा मेरी धमनियों में
पुरुष लुप्तप्राय हैं
घाटी में फंसे हुए सिपाहियों से कहो
अब दलिताएं तुम्हारी सल्तनत नहीं
नाजिम हिकमत से कहो वे लिखें मेरी दास्तान
सुशीला भोतमंगे से कहो
तुम्हें न्याय मिलेगा मेरी बहन
कबीर कला मंच जिन्दा है
डॉक्टर, वकील, अध्यापक से कह दो
समय के साथ वे बदल लें अपना स्लैबस
जिज्ञासाओं का अनंत संसार मेरे भीतर समाया है
बहुत गहरे विशाल ह्रदय में रहते है कई समुद्र
कई योजन सड़कें ख़त्म नहीं होती लाखों वर्ष चलते हुए भी
मैं पद्मिनी नायिका नहीं हूँ
कि स्तन के लोथड़े और मांस के फैलाव को
जीवन की धुरी मान लूँ
मैं चलती हूँ अपने बहुत छोटे क़दमों से
और जीत लेती हूँ आकाश में तुम्हारी बादशाहत
मैं चलती हूँ निरंतर, मैं नींद में भी चलती हूँ
मैं चलती हूँ क्योंकि मुझे चलने की कीमत पता है
पावों में काटती है जूती, हाथों में चूड़ी
कमर में करधनी काटती है
तुम काटते हो पान का पत्ता थूक के लिए
तुम नाखूनों से काटते रहे मैं काटती रही हूँ नाख़ून
पर अब समय बदल रहा है
लोहा काटेगा लोहा कटेगा
मुझे नहीं खेलना गन्दा खेल
मुझे नहीं खेलनी तुम्हारी होली
मैं जानती हूँ तुमने मुझे जलाया है
मैं राख में बची हुई चिंगारी हूँ
तबसे जल रही हूँ जबसे सीता समा गई धरती की कोख में
सावित्री ने त्याग दिए प्राण
राधा को उसका पति छोड़कर चला गया
मुझे मेरे कद से मत नापो
मैं कल्पना चावला नहीं इरोम की बहन हूँ
रमई राम की बेटी
मैं पद्मिनी नायिका नहीं हूँ
कि स्तन के लोथड़े और मांस के फैलाव को
जीवन की धुरी मान लूँ
बलात्कारी कहाँ से आये थे
द्रोपदी !
...............................................................
अपने ही गले में फँसी हुई
जैसे फड़फड़ाती है बंसी की
मछली
वैसे ही फड़फड़ा रही है
देह
मिट्टी होने का असली अर्थ
पानी होने का असली अर्थ
हवा होने का असली अर्थ
बदल रहा है धीरे धीरे
एक पति, दो पति, तीन पति
चार पति, पांच पति
क्या फर्क पड़ता है
प्लास्टिक की काया के लिए
द्रोपदी चीख रही है
मिट्टी होने के लिए
पानी होने के लिए
हवा होने के लिए
और देह गायब है
घायल देश के सिपाही
………………………………………………………………………….
(इरोम शर्मिला के लिए जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)
लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक
मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ
लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है
मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ
जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है की हम उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे
हमारी हरी देहों का दोहन
शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है
उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है
सोचता है मैं हार जाउंगी
घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न
आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है
आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है
आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे मेरी रखवाली करती है
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई
कितनी लाल और मादक है
क्या सोचते हो मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ
मैं इरोम हूँ इरोम
इरोम शर्मिला चानू
(इरोम शर्मिला के लिए जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)
लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक
मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ
लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है
मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ
जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है की हम उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे
हमारी हरी देहों का दोहन
शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है
उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है
सोचता है मैं हार जाउंगी
घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न
आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है
आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है
आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे मेरी रखवाली करती है
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई
कितनी लाल और मादक है
क्या सोचते हो मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं अपनी पीढ़ियों में कायम हूँ
मैं इरोम हूँ इरोम
इरोम शर्मिला चानू
लज्जा तुम्हारा आभूषण नहीं है
......................................................
अंतिम प्रतीक्षा के बाद
इन टापुओं पर फैले बहुत
छोटे-छोटे सूखे कपास
सरकारी दुःख की तरह
तुम्हारे उपांगों की सूखी
हुई चर्बी
तेज हवा के झकोरे से पथराई
हुई लट
यह साबित करते हैं कि
तुम्हें मार दिया गया है
कितनी बार ली गई तलाशी
कितने बार टटोले गए उपांग
कितनी बार विधिपूर्वक
पूछताछ की दरोगा ने
तुम्हारे स्तनों का दूध भय
से सूख गया
यह सब कुछ दर्ज है सरकारी
महकमें के किसी रजिस्टर में
जानता है लाओत्से, पर
तुम्हारे बलात्कार की खबर
अब भी संपादक के कमरे में
पड़ी है
शाम के धुधलके में जब
दारूबाज भेड़िये
तुम्हारी फोटो मुख्यालय भेज
रहे थे
तब उनके चेहरे पर एक
रहस्यमयी मुस्कान थी
हालाँकि उनकी रहस्यमयी
मुस्कान उनके जड़ों से जुडी हुई थी
उन्होंने फोटुयें भेजी
क्योंकि वे नशे में रहे होंगे
वे रिपोर्टें जो तुम पति को
भी नहीं दिखा सकीं
लाल धरती पर फैल गईं मुह
ढके हुए
मैला कमाते हुए भी तुमने यह
नहीं महसूसा होगा
जिस्म इससे भी ज्यादा गन्दा
हो सकता है
तुम्हारे मौलिक अधिकार जो
अब देह में तब्दील हो चुके हैं
हजारो घंटों तक मर्सिया
गाते रहे
कला के लिए नहीं था
तुम्हारा यह सहवास
संगत के लिए नहीं थीं
तुम्हारी ये हथेलियाँ
सत्संग के लिए तुम्हें मंच
पर नहीं बैठाया गया था
बल्कि तुम्हें तुम्हारे
दलितापे से नोच लिया गया था
खैर, तुम ख़त्म नहीं हो रही
हो
तुम्हारे खून में भी आ रहा
है उबाल
तुमने अपने आक्रोश को गीत
में बदल लिया है
तुम्हारे हाथों में रक्खी
हुई किताबें
विद्रोह की ज्वाला में जल
रही हैं
दलिताओं ! लज्जा तुम्हारा
आभूषण नहीं है
तुम्हारा आभूषण है ज्ञान,
विवेक, विद्रोह
खैरलांजी की औरतें
.......................................
मौत चीखी है, लड़ी हैं अंतिम दम तक सासें
उनके हाथ कटने के बाद भी तड़पते रहे हैं
खून फैलकर सैलाब बन गया है
वे जो बची हैं वे आज भी भयभीत हैं
पूरी बस्ती पलायन कर गई है धीरे-धीरे
यह एक स्त्री जो दिखाई दे रही है
गू,
बदबू और चोट के
निशान से सनी हुई
रक्त उगलती अंतड़ियाँ, स्तनों पर फैला हुआ खून
और उसके भीतर तक धंसा हुआ पत्थर
केवल एक स्त्री नहीं है
एक काली देह जो बन गई है कई देहें
ठीक उसी तरह से मारी गईं हैं उसकी तीन-तीन बेटियां
जाँघों पर दिखाई दे रहे हैं पत्थरों के निशान
गर्दन के नीचे से गुजारी गईं हैं लाठियां
रीढ़ की हड्डियों को तोड़ा गया है
उससे भी पहले तड़ाक से तोड़ दिया गया है हाथ
ये जो लोग उसे घेरकर खड़े हैं
वे केवल स्त्रियों को देखने आये हैं
हर आदमी ने देखी है एक स्त्री,
अलग-अलग तरह की बातें
रसविद्ध सुनाई जा रही हैं
दिखाई दे रही हैं फटी हुई देह
सुनाई दे रही गिद्धों की आवाजें
इसके सिवा शायद अभी कुछ न दिखाई दे रहा है
न सुनाई दे रहीं हैं चीखती आवाजें
लेकिन हैवानियत दौड़ी है
तोड़े गए हैं भयभीत दरवाजे
भीतर फट गया है धमनियों का रक्त
तडपा-तडपा के मारा गया है
एक साथ
माँ,
बेटी, दो पुत्रों के साथ
फिर किया गया है बलात्कार उस लाश के साथ
क्या किसी ने देखा है ब्रेनहेमरेज
क्या अंतड़ियों से खून को निकलते देखा गया है
क्या किसी ने देखी है पोस्टमॉर्टेम की प्रक्रिया
खुल गई हैं न्याय की दुकानें
मिलेगा जरुर मिलेगा न्याय
कुछ मांस के लोथड़े, कुछ हड्डियों का चूरमा
कुछ नुकीले दांत चढाने के बाद
निर्भया तुम दिल्ली में थीं
तुम्हारे लिए बनायी गई फ़ास्टट्रैक अदालत
कानून में परिवर्तन हुआ
दरिन्दे आज भी घूम रहे हैं नए शिकार की तलाश में
आठ वर्षों बाद भी क्या खैरलांजी को मिल पायेगा
न्याय
गाय नहीं बकरी माँ है
........................................................
छत्तीस रोगों को काटता है उसका दूध
जब मैं पैदा हुआ, माँ के पीले दूध की जगह
पिलाया गया बकरी का दूध
बकरियां चराते हुए, हमने जाना सहभाव
हमने उनके बच्चों को हाथ में लेकर बहुत प्यार
किया
हमने जाना स्नेह के लिए
जाति और लिंग की जरुरत नहीं
दर्जनों बकरियों वाले घर में
हमारी जीविका का वही रहीं साधन
हम तो भूमिहीन मजदूर थे
हमारे पास नहीं था खेत
खेत नहीं था तो गोबर की जरुरत नहीं थी
फिर जब हम गाय का दोहन नहीं करते तो कैसी गाय
माता
हमने उन्हें देखा किसी दशा में प्रसन्न रहना
रुखा-सूखा जो मिल जाय खुश होके खाते जाना
न किसी से ईर्ष्या न द्वेष
न वैतरणी पार कराने की जहमत
वे चाहती नहीं थीं सांस्कृतिक बगावत
वे समाज में भेदभाव भी पैदा नहीं कराना चाहती
हिन्दू और मुस्लिम क्या ?
उन्होंने जाति को सिरे से नकार दिया था
अजीब सहभाव था उनके भीतर
वे सच्चे अर्थों में त्यागमूर्ति होती थीं
वे निभाती थीं माँ का पूरा रोल
जीते हुए, मरने के बाद भी
उनकी चमड़ी से हम बनाते थे ढोल
बनाते थे खजढ़ी, तम्बूरा
अपने देवता का स्मरण करते हुए
नदी का आचमन करते थे
बकरी का साहचर्य हमारी दिनचर्या का अंग
वह हमारी गरीब साथिनें थीं
स्कूल में गाय पर निबंध लिखते हुए
भूल जाते थे हम गाय पर लिखना निबंध
हमें गाय की जगह याद रहता था बकरी का चेहरा
हम बकरी को याद करके गाय पर निबंध लिख देते
थे
आज मैं बकरियों से भरे इस शहर में खुश हूँ
कोई प्रतिरोध नहीं, कोई वैचारिक चुप्पी नहीं
मैं उनसे भी खुश हूँ ‘जो मुझे बलि का बकरा समझते
रहे’
बकरी खाती नहीं गाय की तरह विष्ठा
एकदम शुद्ध शाकाहारी, खाती है अहिंसक घास
वह रखती है पवित्र होने का अधिकार
हाँ, उसका अस्तित्व मेरा धर्म है
खुल रही हैं गांठे
गाय से ज्यादा बकरी के दूध का उपकार है मेरे
भीतर
गाय नहीं, बकरी माँ है
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