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सोमवार, 2 दिसंबर 2013

जातिवादी होने का लांछन (व्यंग्य)

डॉ. कर्मानंद आर्य
मैंने अपने किसी लंगोटिए यार से मुफ्त में सलाह ली की मैं जातिवादी होना चाहता हूँ. दोस्त हाथी की तरह कान हिलाते हुए बोला पगला गए हो एकदम्मै. धीरे धीरे मिमिआओ कौवे की तरह काँव-काँव मत करो. जातिवादी सब हैं पर तुम्हारी तरह ढिंढोरा पीट कर थोड़े. अपने पाण्डेय जी को ही देख लो जातिवाद के धुर विरोधी हैं. सभी सभा-समितियों में जातिवाद का खंडन करते हैं पर अन्दर ही अन्दर उनसे बड़ा घाघ कोई नहीं है. उनकी गइयो गाभिन बैलो गाभिन. सारा मालपुआ उनके ही रिश्तेदार चाट रहे हैं. पर तुम्हारी तरह बिलबिलाते नहीं की जातिवादी होना है. भीतर-भीतर काम करो. वैसे भी तुम तो पढ़े-लिखे हो ऐसी बातें करोगे तो समाज के करता-धरता तुम्हारा लंगोट फाड़ के जंतर-मंतर पर विरोध जताएंगे. नौकरी से भी जाओगे. ऊपर से कल ही चार पन्ने का स्पष्टीकरण कूद कर आ जायेगा.
मैंने सोचा दोस्त की बात में रहस्य है. वैसे सारे दोस्त ज्ञानी होते हैं यदि उनकी बात ठीक वैसे ही मान लो जैसे वे कहते हैं. न नुकुर किया तो समझ लो कह देगा भाई दादा बनने की कोशिश मत करो.  दोस्त ही अच्छे लगते हो दादा नहीं. लगा जब हम ऐसे घिसे पिटे मानसिकता वाली सोच  पर बात करेंगे तो कोई अच्छा थोड़े ही कहेगा. जाति की राजनीति करो, जाति के नाम पर सभाएं करो, हुंकार रैली करो, स्वाभिमान बचाओ रैली करो सब जायज है. बस्स जाति की बात की नहीं की सब पिल पड़ेंगे. कहेंगे बहुत चला है प्रोफेसरी दिखाने. लगता है जैसे कोटे से आया है तो कोटे की बात करेगा ही. बस केवल लेक्चर झाड़ना है चाहे इससे कुछ हो न हो. दोस्त को कैसे समझाऊ की मेरी पीड़ा दूसरे किस्म की है. अब मेरी पीड़ा कोई कैसे समझे. नाम के आगे एक टाइटल लगाने मात्र से काम बन या बिगड़ जाता है. बड़े-बड़े डील का सेकण्ड्स में वारा-न्यारा हो जाता है. इतनी मुंह दिखाई तो ससुराल आयी बहुरिया को भी नहीं मिलता जितना पीछे के जुगाड़ से जातिवादी को मिल जाता है. बड़ी-बड़ी कुर्सी, टेंडर, हिस्सा तो बहुत ही छोटी चीज है.
 सबका आरक्षण है. जाति के हिसाब से ही पद मिलता है. अपने भारत में तो खासकर आपकी जाति यह निर्धारित कर देती है कि आप भविष्य में किस व्यवसाय अथवा नौकरी में जाओगे. आपको छोटका नौकरी यानी झाड़ू-पोछा, खलासी-ड्राइवर, चपरास करनी है या सामंती हुक्म चलाना है नीति निर्माता या भाग्यविधाता बनना है. मान लो कोई मेहतर कुल में जन्म लिया है तो उसे जिन्दगी भर टट्टी उठाने को मजबूर होना ही पड़ेगा. दुर्भाग्य से किसी नौकरी में आ गए तो वहां भी अछूत बने रहोगे. कभी विभागाध्यक्ष तो बन भी नहीं सकते और बन भी गए तो बिना कृपा के कुछ करके दिखाओ तो दुनिया जान जाये. मान लो कभी नौकरी की ‘जूठन’ मिल जाय तो आप ओमप्रकाश बाल्मीकि के भी बाप हो जाएँ या आपको भी ‘एक भंगी वाइसचांसलर की आत्मकथा’ लिखनी पड़ जाय. दलित-ब्राम्हण कभी रोड पर झाड़ू नहीं लगाता मिलेगा इसी तरह ब्राह्मण-दलित कभी मंदिर में पूजा नहीं करा सकता चाहे दोनों में गुण कूट-कूट कर भरा हो.
नंगी चीजें आँखों को सुख देती हैं पर निर्भर करता है की वे कितनी नंगी हैं. यदि नंगापन ज्यादा होगा तो सब बिलबिलाकर बह जाएगा और आप अनुभव करेंगे की आपने स्वप्न में यथार्थ का अनर्थ कर लिया है. मैंने जोर का तर्क दिया जातिवादी बनने के बहुत फायदे हैं यदि आप इसका व्याकरण समझ गए तो समझो आपकी लाटरी लग गई, आप मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं. अभी सारे के सारे मुख्यमंत्री को इसी की कृपा प्राप्त है. किस जाति के विधायक सबसे ज्यादा हैं, पार्टी का अध्यक्ष किस जाति का है. पार्टी किस-किस जाति की राजनीति करती है. जाति का दबदबा है आप सब पर रोबदाब झाड़ सकते हैं. अधिकारी से बात मनवा सकते हैं. अपने नाते रिश्तेदार को कहीं भी फिट करा सकते हैं. मैं तो लालू चालीसा की तरह जाति चालीसा लिखने की सोच रहा हूँ. कम से कम चारण बनने का अवसर तो प्राप्त हो जायेगा.
लोग मिलने पर सबसे पहले यह जानना चाहते हैं की अगले की जाति कौन सी है. आप कहाँ और किस मुहल्ले से हो. पूरा नाम क्या है? मतलब नाम के आगे क्या लगाते हैं. बस उसी से आदमी की पूरी औकात पता लग जाती है कि उसे कहाँ नाधना है. दोस्त ने ऐसे मुंह फाड़ा जैसे रंगा सियार फाड़ता है. तो तुमने सारी दुनिया को जातिवादी मान लिया. अब बताओ बाबा कामदेव, फलाने पापू की जाति क्या है?  मैंने तर्क दिया लोग गुरु की जाति देखकर ही दीक्षा लेते हैं. जैसे ब्राम्हण का गुरु ब्राम्हण, राजपूत का राजपूत और बनिए का बनिया. क्या तुमने कोई हाई प्रोफाइल दलित बाबा देखा है जिसके आगे पीछे रूपसियाँ घूमती हैं. दोस्त ने कहा गुरुओं के काले कारनामें, घोटाले, व्यभिचारों पर राजनीति मत करो. बाबा लोगों की इन्द्रिय तो शिथिल होती है वो गलत काम कैसे कर सकते हैं एकाध नित्यानंदों को छोड़कर. हालांकि इस तथ्य में आंशिक गड़बड़ी भी हो सकती है बाद में उन्होंने जोड़ा. अब कबीर तो हैं नहीं जो कहते जो तू बाभन बभनी जाया आन बात काहे न आया.
‘जाति ही पूछो साधु की’ वाली पंक्तियाँ आपने सुनी तो अवश्य होगीं. जब जाति हमारे समाज का बहुत ही अहम् हिस्सा है तो उसपर खुलकर बात करने से भला क्या हर्ज. जाति का मुद्दा कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है कि इसको लेकर कोई शर्मिंदा हो. जाति कुछ लोगों के लिए ही शर्म का विषय है बाकि इस देश के अधिकतर लोग बड़े गर्व से बताते हैं की वे फला-फला जाति के हैं और उन्हें लोग सम्मान से आँखों पर बिठा लेते हैं. आप तो समझदार हैं सो  आप ही बताइए जाति अच्छी चीज है की नहीं.  वैसे जो लोग अपनी जाति पर शर्म करते हैं उन्हें डूब मरना चाहिए. उन्हें चाहिए कि वे अपनी जाति इस तरह से बताएं की सामने वाले को सांप सूंघ जाए. लोगों को जातीय मनोबल उन्हें आगे बढ़ता है, वह प्रेरक शक्ति है. दलित और पिछड़े सरमाने के कारन ही पीछे रह गए. अपनी जाति पर गर्व करने वाला इस दुनिया में बहुत उन्नति कर सकता है समाज में उदाहरण देख लो. जातिवादी को आगे बढ़ने के लिए खुदबखुद रास्ते खुलते चले जाते हैं.
दोस्त ने कहा भाई इतनी देर से पिला रहा है अब कुछ खिला पिला दे. मैंने कहा ये काम विदेशी कंपनियों का है. बात जातीय राजनीति की आयी तो मैंने कहा अब नेता की जाति मत पूंछ लेना. क्योंकि उसका गणित जाति से उल्टा होता है. मान लो यदि ब्राम्हण पार्टी है तो वह मान के चलती है की अपने वोट तो मिलेगे ही अन्य के लिए दूसरा जुगाड़ खोजो. उनके लिए पौवा पानी का इंतजाम करना ही पड़ेगा. उत्तरप्रदेश में जाकर देख लो. तो क्या तुम भी अपने पुत्र को गद्दी देना चाहते हो? मैंने बच्चे की तरह झुनझुना हिला दिया. अभी देश के गृहमंत्री मीडिया को बता रहे थे भारत में जाति-पाँति पाकिस्तान से आया. क्योंकि कोई भी बुरी चीज वहीँ से आती है.
हालाँकि अपवाद तो सब जगह होते हैं. मैंने सोचा एक मैं ही होनहार बिरवान हूँ चलो हवा में ढेला उछालता हूँ क्या पता कुछ टपक ही पड़े तथापि सावधानी बरतनी भी जरुरी है. इसे मैं पवित्र पाप की तरह ले रहा हूँ अतः उल्टी कलम से लिख रहा हूँ. सोचा दवाई देने से पहले कोई ऐसी खुराक दूँ की भैंस भी न मरे लाठी भी टूटे जाए. उस कटेगरी के लोग इसे न पढ़े जिनका आगे जिक्र आया है. जिसका कभी ह्रदय का आपरेशन हुआ हो, सेक्युलर होने की बीमारी हो, अपनी जाति से स्वाभाविक घृणा हो या कभी भी जातिदंश न झेला हो, समाज से जिनका बेहतर तालमेल ना हो. ऐसी ही नेक सलाह कमजोर दिल किन्तु सुंदर स्त्रियों को भी दी जाती है हालाँकि यह मेरी व्यक्तिगत सलाह न समझी जाए क्योंकि मुझे घर वापस जाना है. मैं कोई पंगा नहीं खड़ा करना चाहता की मुझे अपने पद से इस्तीफा देना पड़ जाए बच्चे सांसत में पड जाएँ और पड़ोसन बात करना छोड़ दे. पता चले व्यंग्य की जगह इस्तीफा लिख रहे हैं. हेडक्वार्टर में लम्बी सुनवायी चले फलतः कटघरे में खड़े किसी मर्द को घोड़े की तरह हँसना पड़े.
यहाँ स्त्रीजाति की बात तो हो भी नहीं रही है. स्त्रियाँ जाति के मामले में उदार भी होती हैं. कहते हैं स्त्रियों की कोई जात नहीं होती. चलो कम से कम वो सेकुलर तो हुईं. संसद ने अभी हाल ही में बहुत सी नयी धाराएँ बनाई हैं जिसमें हँसने बोलने को अपराध माना गया है. छेड़छाड़ से संबधित बिल पास किये हैं. महिला आरक्षण बिल  भले ही न पास हुआ हो पर नारी सशक्तिकरण की पूरी फोटो विज्ञापन में तो दिखती ही है. स्त्री को जातिवादी मानने से फर्क ही क्या पड़ता है क्या वे समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं.
जातिवादी टिप्पड़ी करना तो पाप है ही आजकल मजाक करते हुए भी डर लगता है. अब पुराने दिन नहीं रहे जब आप होली के बहाने सारा रंग कहीं भी पोत देते थे. समय बदल गया है. अब उसी दिन एक साहब बता रहे थे की जब उन्होंने डिमांड पूरी नहीं की तो उनपर उत्पीड़न का मुकदमा दायर कर दिया गया. अब छिपो किस बिल में छिपते हो. मुसहर पानी डाल डाल कर निकालेंगे. सहकर्मी से मजाक करो तो कोई न कोई बुरा मान ही लेता है. यदि आप की सहकर्मी ज्यादा सुंदर हो तो कहना ही क्या? शिकायत का मौका बढ़ जाता है लेकिन एक फायदा भी है काम में भी मन लगता है और दिन अच्छा गुजार जाता है. मेरा मानना है की सठियाये हुए जवान ऐसे गलतियाँ किसी न किसी बहाने से कर ही लेते हैं.
इंसान तो गलतियों का ही पुतला है. ठीक से गलती किया और मुस्करा कर सॉरी बोल दिया. बोलने में क्या जाता है हिंदी में थोड़े ही कहना है की मैं अपने इस कृत्य के लिए शर्मिंदा हूँ. पर यह जाति के मामले में नहीं चलता. लोग औकात पर ले लेते हैं. मौका मिलते ही जाति दर्प में घर ही नहीं जलाते अस्मत भी लूट लेते हैं. पिटी हुई जाति आजकल दलित जाति हो गई है. जिसकी सभी प्रकार की संपत्तियों को लोग सरकारी माँ कर चलते हैं. जहाँ जी चाहा कुत्तों की तरह टांग उठा दी.
मान लिया आप निचली जाति से हैं और आपने गलती कर ही दी तो सफाई देते समय नौकर की तरह झाड़ू पोंछा लगाना पड़ता है, अब नौकर की जात ही क्या? परत-दर-परत खुरच-खुरच कर साफ करना पड़ता है. जैसे प्रधानमंत्री की गाड़ी आ रही हो. साफ नहीं किया तो सस्पेंड. झेलो जिन्दगी भर जिल्लत. गंदे रास्ते पर उनकी गाड़ियों के पहिये नहीं डोलेंगे चाहे पूरा देश कूड़े का ढेर हो जाए मरे या भाड़ में चला जाए. ठीक यहीं पता चलता है कि वे कोई कमजोर प्रधानमंत्री नहीं जिसको फेसबुक वाले अधिकतर टैग करते रहते हैं. वह बहुत बोल्ड किस्म के इंसान हैं और केवल एक व्यक्ति की ही बात मानते हैं. वह मरद ही कैसा जो खुद को कमजोर समझे. हमारी आदत है की बनिए की तकड़ी हो गई है मारे बिना रहा नहीं जाता. कुछ अधिक के फेर में छापा भले पड जाए पर मिलावट तो करनी ही है. अभी आज के ही अखबार में था की कुछ लोग गाय की चर्बी से घी तैयार कर रहे है. कोई पहचान नहीं सकता चलो तैयार शुद्ध देसी घी. चाहे देवता को अर्पित करो चाहे खाओ कोई मना करने वाला थोड़े ही है. देवता भी चुपचाप भोग लगा लेते हैं फेरे में कौन पड़े.
कितनी सुंदर परिघटना है जिसके हिसाब से सारा खेल शुरू होता है लोग उसी के बारे में सार्वजनिक बातें करते हुए हिचकिचाते हैं. प्रगतिशील लोग दुहाई देते हैं की उनकी केवल उनके घर में नहीं चलती बाकी तो वो पूरी दुनिया का ठेका लेकर चलते हैं अबकी बार वे जाति मिटाकर ही छोड़ेगे. चलो मैंने तो जाति-पाँति मिटाने की कसम तो नहीं खाई है. मुझे तो यह समझ आता है की जो जितने जातिवादी हैं उन्होंने उतनी ही उन्नति की है. इतिहास गवाह है हीनता की ग्रंथी पाली हुई जातियां कभी राजा नहीं बनी. उन्होंने केवल सेवादार का काम किया ठीक इसके विपरीत जिन्हें अपनी जाति पर गर्व है वे दुनिया के सामने छाती खोल कर खड़े हो गए और राजा बने. राजपूतों ने कभी भी अपने बच्चों को यह सलाह नहीं दी की तुम पिटके आना उलटे कहा कि पीट कर आना बाद में हम देख लेंगे.
चलो खैर, अधिकतर लोग भ्रम में जीते हैं की वे जातिवादी नहीं हैं. अपने आप को मॉडर्न कहते हैं. कहते हैं की मैं जाति-पाति नहीं मानता. ऐसे लोग ही समाज के लिए असली खतरा हैं. ये बरगलाने वाले पंडित पोंगा हैं, बाबा हैं और मूर्ख जनता इनके कहने में आ जाती है.  कुछ सरकारें जान बूझ कर इस मसले को गर्म मसाले की तरह प्रयोग करते हैं. अब गर्म मसाला डाल कर कोई खीर तो पकाता नहीं. मुर्गा पकाते-बनाते हैं. इस सुन्दर विषय की डिमांड लगातार बनी हुई है. अब तो ज्यादा ही प्रासंगिक है क्योंकि दलित-आदिवासी साहित्य आजकल उभार पर है. ऱोज ही नई-नई दलित आत्मकथाएं लिखी जा रहीं हैं. हिंदी में तो जातीय साहित्य भरा पड़ा है. आप पूरा हिंदी साहित्य पढ़ लें. बहुत सी जातियां वहां भी गायब हैं. लेखक अपनी जाति को दिमाग में रखकर किताबें लिखता है. प्रकाशक जाति के अनुसार लेखकों की किताबें छापता है. जाति के अनुसार ही पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, पुरस्कार मिलता है. आखिर मैंने क्या अपराध किया है सोचता हूँ मैं भी ठीक से जातिवादी हो जाऊं फिर देखिये कैसे रंग खिलता है.
डॉ. कर्मानंद आर्य
सहायक प्राध्यापक, भारतीय भाषा केंद्र
 बिहार केन्द्रीय वि.वि. गया, बिहार 
Karmam1984@yahoo.co.in


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